
फ्लैशबैक - शादी का दिन
एक घर के आँगन में सजा हुआ छोटा-सा मंडप हल्की रोशनी में जगमगा रहा था।
हवन कुंड में जलती आग की लपटें हवा के साथ धीरे-धीरे लहरा रही थीं।
चारों ओर मंत्रोच्चार की पवित्र ध्वनि गूँज रही थी।
और उसी मंडप के बीचों-बीच...
आरव और तन्वी सात फेरों के बंधन में बंध रहे थे।
आरव चुपचाप तन्वी के साथ फेरे ले रहा था।
उसके चेहरे पर न कोई खुशी थी...
न कोई उत्साह...
न ही इस शादी को लेकर कोई अपनापन।
उसका चेहरा बिल्कुल भावहीन था।
जैसे वह वहाँ मौजूद तो था...
वहीं दूसरी ओर...
तन्वी के कदम हल्के-हल्के काँप रहे थे।
उसकी उँगलियाँ घबराहट में आपस में उलझी हुई थीं।
वह किसी गहरे दर्द और डर में खोई हुई लग रही थी।
फिर भी...
उसके मासूम चेहरे पर एक अलग ही सादगी थी
उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में नमी तैर रही थी...
मानो वह रोना नहीं चाहती थी, लेकिन आँसू उसकी बात मानने को तैयार नहीं थे।
हवन कुंड की सुनहरी रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे उसकी मासूमियत और भी साफ़ दिखाई दे रही थी।
कुछ ही देर बाद...
पंडित जी ने मंत्रोच्चार पूरा किया और गंभीर स्वर में बोले
"आप दोनों सात जन्मों का साथ स्वीकार करते हैं?"
उनकी आवाज़ मंडप में गूँज उठी।
लेकिन उसी पल...
आरव की नज़र सामने जलती हुई हवन कुंड की आग पर टिक गई।
उसकी आँखों में ठंडा गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था।
फिर उसने बिना किसी की ओर देखे...
धीरे से, सिर्फ तन्वी के सुनने लायक आवाज़ में कहा—
"मैं कभी नहीं निभाऊँगा इस शादी को…"
तन्वी की पलकें एक पल के लिए काँप गईं।
लेकिन आरव रुका नहीं।
उसकी आवाज़ में वही सख्ती बनी रही
"तुमने बहुत बड़ी गलती कर दी है मुझसे शादी करके..."
"इस के लिए तुम्हें हर रोज़ पछताना पड़ेगा।"
"मैं तुम्हारा जीना दुश्वार कर दूँगा..."
"इतना दर्द और नफ़रत दूँगा कि तुम ज़िंदगी भर उसे याद रखोगी।"
उसके शब्द किसी धारदार चाकू की तरह तन्वी के दिल में उतरते चले गए।
यह बातें सिर्फ तन्वी के कानों तक पहुँची थीं।
बाकी सभी लोगों के लिए वहाँ अब भी एक सामान्य शादी चल रही थी।
लेकिन तन्वी की दुनिया उसी पल जैसे थम गई।
उसकी आँखों में रुके हुए आँसू आखिरकार पलकों की कैद तोड़कर बाहर निकल आए।
उसका पूरा शरीर काँप उठा।
उसने मुश्किल से खुद को संभालने की कोशिश की।
लेकिन उसके दिल की धड़कनें बेकाबू हो चुकी थीं।
आने वाले कल का डर...
नफ़रत से भरे रिश्ते का डर...
और उन अनगिनत ज़ख्मों का डर, जिनकी चेतावनी अभी-अभी उसे मिली थी।
सब एक साथ उसके भीतर तूफ़ान बनकर उठ खड़े हुए थे।
फिर भी...
वह चुप रही। बिल्कुल चुप।
जैसे उसके पास दर्द सहने के अलावा कोई और रास्ता ही न हो।
तभी अचानक...
आरव के कानों में एक आवाज़ गूँजी।
शायद...
तन्वी की।
और अगले ही पल वह उन गुज़रे हुए पलों की यादों से बाहर आ गया।
उसकी आँखें फिर से आज में लौट आईं।
और इसी तरह...
रात धीरे-धीरे बीतती चली गई।
अगली सुबह...
हॉस्पिटल के कॉरिडोर में फैली सफेद रोशनी रात भर की बेचैनी को और भी साफ़ कर रही थी।
ICU के बाहर लगी बेंच पर आरव चुपचाप बैठा था।
पूरी रात उसकी आँखों में नींद का एक कतरा भी नहीं आया था।
उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं।
चेहरा थकान से बुझा हुआ लग रहा था।
लेकिन सबसे ज़्यादा डरावनी चीज़ थी उसकी कमीज़...
जो अब भी तन्वी के खून से पूरी तरह सनी हुई थी।
उसकी मुट्ठी में तन्वी की टूटी हुई चूड़ी का एक छोटा-सा टुकड़ा कसकर दबा हुआ था।
इतना कसकर...
मानो वह उस टूटे हुए टुकड़े के साथ तन्वी को भी अपने पास रोके रखना चाहता हो।
उसकी नज़रें सामने दीवार पर टिकी थीं।
लेकिन उसका मन कहीं और भटक रहा था।
तभी...
समीर आकर उसके पास बैठ गया।
उसने एक गहरी साँस ली और धीरे से कहा
"भाई... डॉक्टर ने कहा है भाभी की हालत अभी भी ठीक नहीं है। बहुत खून बह गया था... इस लिए रिपोर्ट्स का इंतज़ार कर रहे हैं। उसके बाद ही कुछ कह सकते है।"
समीर की बात सुनकर भी आरव ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
उसकी आँखें अब भी सामने दीवार पर टिकी रहीं।
जैसे उसने कुछ सुना ही न हो।
कुछ देर बाद...
काव्या हाथ में एक बैग लिए वहाँ आई।
उसने अपने भाई की हालत देखी तो उसका दिल भर आया।
वह धीरे से उसके पास खड़ी होकर बोली।
"आरव भाई, मैं घर से आपके लिए कपड़े लाई हूं... प्लीज चेंज कर लीजिए..."
आरव ने उसकी तरफ देखना भी जरूरी नहीं समझा।
उसकी थकी हुई और नम आवाज़ धीमे से निकली
"नहीं, मुझे अभी कुछ नहीं करना... पहले तन्वी को होश आने दो, उससे मिलना है मुझे।"
काव्या ने बेबस होकर समीर की तरफ देखा।
फिर इशारे से उसे समझाने को कहा।
समीर कुछ पल सोचता रहा।
फिर हल्के से बोला
"अरे भाई, काव्या सही कह रही है... और अगर भाभी होश में आई और आपको इस हाल में देखा... तो डर जाएंगी। आपको चेंज कर लेना चाहिए प्लीज।"
काव्या ने तुरंत हामी भरते हुए कहा-
"राइट भाई... समीर भाई बिल्कुल ठीक कह रहे हैं."
इस बार आरव ने धीरे से खुद की ओर देखा।
उसकी नज़र अपने हाथों पर गई।
फिर अपनी कमीज़ पर।
वह सच में बहुत डरावना लग रहा था।
हाथों पर सूखता हुआ खून...
शर्ट पर लाल धब्बे...
लाल आँखें...
और चेहरे पर पूरी रात की जागी हुई थकान।
कुछ पल चुप रहने के बाद...
वह बिना कुछ कहे काव्या के हाथ से कपड़ों का बैग ले लेता है।
फिर धीमे कदमों से मेल वॉशरूम की ओर बढ़ जाता है।
उसे जाते देख काव्या भी वापस समीर के पास बैठने ही वाली थी कि अचानक उसका चेहरा बदल गया।
उसने झटके से अपना माथा पकड़ लिया।
"Oh no... भाई!"
समीर ने चौंककर उसकी तरफ देखा।
"क्या हुआ?"
काव्या मुंह बनाते हुए बोली-
"भाई... मैं घर से खाना भी लाई थी, लेकिन कार में ही भूल गई! आप यही रहो, मैं ले कर आती हूं."
समीर ने हल्के से सिर हिला दिया।
और काव्या बिना समय गंवाए जल्दी-जल्दी पार्किंग एरिया की ओर बढ़ गई।
वह तेज़ कदमों से अपनी गाड़ी की तरफ जा रही थी।
लेकिन जल्दबाज़ी में...
अचानक किसी से टकरा गई।
उसका संतुलन बिगड़ गया।
वह गिरने ही वाली थी कि-
दो मजबूत बाँहों ने उसकी कमर थाम ली।
काव्या की साँस एक पल को अटक गई।
उसने तुरंत नज़रें उठाईं।
और अगले ही पल उसका चेहरा हैरानी और गुस्से से सख्त हो गया।
क्योंकि सामने...
कबीर खड़ा था।
दिखने में वह काव्या से लगभग सात-आठ साल बड़ा लग रहा था।
उसकी आँखों में काव्या के लिए चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।
और होंठों पर हमेशा की तरह वही हल्की मुस्कान थी।
लेकिन उसे देखते ही काव्या तुरंत उससे अलग हो गई।
उसकी आँखें बड़ी हो गईं।
"कबीर?! तुम... तुम यहां? क्यों ? मतलब क्या करने आए हो?"
कबीर ने हल्की मुस्कान दबाते हुए कहा-
"कौन? मैं? मैं तो बस... क्रिकेट खेलने आया था! और तुम ? तुम क्या खेलने आई थी?"
काव्या ने भौंहें चढ़ा लीं।
"क्रिकेट?! हॉस्पिटल में?! Seriously?!"
कबीर ने मुस्कुराते हुए अपने हाथ सीने पर बाँध लिए।
"अरे वह... तो तुम सोचती भी हो मतलब तुम पागल नहीं हो! तो फिर पागलों वाले सवाल क्यों? करती हो?"
काव्या ने झुंझलाकर कहा-
"बिल्कुल भी शर्म नहीं है तुम्हे! मेरी भाभी अंदर life and death से जूझ रही हैं, और तुम यहां जोक मार रहे हो?!"
यह सुनते ही कबीर का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया।
वह काव्या के थोड़ा करीब आया और बोला-
"देखो तन्वी को... आरव कुछ नहीं होने देगा। इस लिऐ तुम्हे उसकी चिन्ता करने की जरूरत नहीं है लेकिन अब तुम... जब हॉस्पिटल आ ही गई हो, तो चलो अपना दिमाग का भी चेकअप करवा लो."
काव्या ने उसे तिरछी नज़रों से देखा।
"क्यों? मुझे क्या हुआ है?"
कबीर उसके थोड़ा और करीब आकर बोला-
"दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा... मैं हॉस्पिटल में हूं और तुम मुझे पूछ रही हो कि यहां क्या कर रहा हूं..."
काव्या ने झल्लाकर पूछा-
"तो किस से मिलने आया हो?"
इस बार कबीर ने eyebrow raise की।
"ओहो! देखा... तुम्हे सच में डॉक्टर की जरूरत है."
काव्या ने गुस्से में अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।
"Shut up कबीर."
काव्या का गुस्सा देखकर कबीर थोड़ा झुककर उसके करीब आया और बोला-
"मैं यहाँ तुम्हारी भाभी से मिलने आया हूं, आरव ने बुलाया है मुझे, और कुछ?"
काव्या की आँखों में अचानक गुस्से के साथ कोई पुराना दर्द भी उभर आया।
वह कुछ पल उसे घूरती रही।
फिर बिना कुछ कहे वहाँ से आगे बढ़ गई।
कबीर की मुस्कान भी धीरे-धीरे फीकी पड़ गई।
उसने हल्का-सा सिर झुका लिया।
उसकी आँखों में भी कहीं न कहीं अफसोस झलक रहा था।
और फिर...
वह भी चुपचाप काव्या के पीछे चल पड़ा।
कुछ देर बाद...
हॉस्पिटल के डॉक्टर के केबिन में एक भारी सन्नाटा पसरा हुआ था।
कमरे में सिर्फ एसी की धीमी आवाज़ और रिपोर्ट्स के पन्ने पलटने की हल्की सरसराहट सुनाई दे रही थी।
डॉक्टर अपनी मेज़ पर रखी रिपोर्ट्स को ध्यान से देख रहे थे।
वहीं सामने कुर्सियों पर आरव, समीर और कबीर बैठे थे।
तीनों की नज़रें डॉक्टर पर टिकी हुई थीं।
सब बेसब्री से उनके कुछ बोलने का इंतज़ार कर रहे थे।
लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा था...
आरव का धैर्य जवाब देता जा रहा था।
उसकी उँगलियाँ कुर्सी के हैंडल पर लगातार थाप दे रही थीं।
जबड़े कस चुके थे।
और आँखों में बेचैनी साफ़ दिखाई दे रही थी।
आखिरकार...
उसने गुस्से भरी नज़रों से डॉक्टर को घूरते हुए कहा-
"बोलो डॉक्टर, क्या हुआ है तन्वी को? और आपने मुझे क्यों बुलाया था?"
उसकी आवाज़ में बेचैनी और आदेश दोनों साफ़ महसूस हो रहे थे।
"Tell me clearly."
"मुझसे कुछ भी छुपाने की जरूरत नहीं है..."
"Otherwise..."
आगे के शब्द उसने अधूरे छोड़ दिए।
लेकिन उसके चेहरे के भाव ही काफी थे यह समझाने के लिए कि वह कितना तनाव में था।
डॉक्टर ने हल्के से गला साफ़ किया।
आरव की तीखी नज़रों के बावजूद उन्होंने खुद को शांत रखने की कोशिश की।
फिर संयत स्वर में बोले-
"Mr. सिंघानिया, reports आ गई हैं।"
तीनों की नज़रें तुरंत डॉक्टर पर टिक गईं।
"सब ठीक है..."
यह सुनते ही कमरे का तनाव थोड़ा कम हुआ।
लेकिन डॉक्टर अभी रुके नहीं।
उन्होंने आगे कहा-
"बस कुछ serious external injuries हैं..."
"लेकिन उन्हें अभी तक होश नहीं आया..."
"इसलिए अब हम उनके internal organs की complete scanning करवाना चाहते हैं।"
डॉक्टर की बात खत्म होते ही समीर ने राहत की साँस ली।
फिर धीरे से बोला-
"तो कराइए न... इसमें पूछने वाली क्या बात है?"
डॉक्टर ने एक पल के लिए समीर की ओर देखा।
फिर अपनी नज़रें वापस आरव पर टिकाईं।
"सर, बस आपको inform करना था..."
"बाकी process हम handle कर लेंगे।"
कुछ सेकंड तक कमरे में फिर खामोशी छाई रही।
आरव डॉक्टर को अपनी गहरी और तीखी नज़रों से देखता रहा।
फिर उसने एक लंबी साँस ली।
उसके चेहरे पर थकान साफ़ झलक रही थी।
लेकिन उसकी आँखों में सिर्फ एक ही चिंता थी
तन्वी के लिए।
वह धीमे लेकिन बेहद गंभीर लहज़े में बोला-
"Do whatever you want to do..."
"बस मुझे मेरी तन्वी ठीक चाहिए..."
उसकी आवाज़ अचानक और भारी हो गई।
"वरना..."
वह कुछ पल रुका।
फिर आरव डॉक्टर की आँखों में देखते हुए बोला-
"तुम जानते हो तुम्हारे साथ क्या-क्या हो सकता है।"
डॉक्टर ने तुरंत सिर हिला दिया।
कमरे में फिर एक अजीब-सी खामोशी फैल गई।
अगले ही पल...
आरव अपनी कुर्सी से उठा।
उसने किसी की तरफ दोबारा नहीं देखा।
न डॉक्टर की तरफ...
न समीर की तरफ...
न कबीर की तरफ।
वह सीधे केबिन से बाहर निकल गया।
उसके कदम तेज़ थे।
और उसकी मंज़िल सिर्फ एक थी-
तन्वी का ICU रूम।
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